एक दरिया ही तो
बहता है तुम में
साहिल पर जैसे
लहरे छोड़ जाता है समंदर
तुम भी अपने लबो के छोर पर
अटका देती हो
एक चौथाई मंद मुस्कान
बरसता है जब भी
पानी
तुम अक्सर बारिशो के पार दिखती हो
मानो खींच रखी हो
भीगी पारदर्शी रेखा
मेरे तुम्हारे बीच
किसी लक्ष्मण ने
बढ़ाता हु हाथ
कि छू लू उंगलियों के
गीले पोर
तो तुम कच्ची धूप में
झट से अपना बदन
सूखा लेती हो
पलट कर जाने लगता हूँ
तो
खोल देती हो गीले बालो
का एक सिरा
अब
सब महकने लगता है
और तुम्हारी ओर का बांया
कंधा भीग
जाता है
जैसे बाँध टूटा हो
झरने का
बरसो बरस के लुकाछिपी में
न मिली मुझे ,न दिल टूटा है
तुम साथ भी नहीं , ना दामन छूटा है
लेकिन
एक अक्स मेरे वजूद का
रहता है तुम में
एक दरिया ही तो
बहता है तुम में
जादुई शब्द, जादुई आवाज़ में सुनें..https://www.youtube.com/watch?v=a_SYZhxZH2w
© अविनाश त्रिपाठी
