Wednesday, August 26, 2020

एक दरिया ही तो बहता है






एक दरिया ही तो
बहता है तुम में
साहिल पर जैसे
लहरे छोड़ जाता है समंदर
तुम भी अपने लबो के छोर पर
अटका देती हो
एक चौथाई मंद मुस्कान
बरसता है जब भी
पानी
तुम अक्सर बारिशो के पार दिखती हो
मानो खींच रखी हो
भीगी पारदर्शी रेखा
मेरे  तुम्हारे बीच
किसी लक्ष्मण ने
बढ़ाता हु हाथ
कि छू लू उंगलियों के
गीले पोर
तो तुम कच्ची धूप में
झट से अपना बदन
सूखा लेती हो
पलट कर जाने लगता हूँ
तो
खोल देती हो गीले बालो
का एक सिरा
अब
सब महकने लगता है
और तुम्हारी ओर  का बांया
कंधा भीग
जाता है
जैसे बाँध टूटा हो
झरने का
बरसो बरस के लुकाछिपी में
न मिली मुझे ,न दिल टूटा है
तुम साथ भी नहीं , ना दामन छूटा है
लेकिन
एक अक्स मेरे वजूद का
रहता है तुम में
एक दरिया ही तो
बहता है तुम में 
 
जादुई शब्द, जादुई आवाज़ में सुनें..https://www.youtube.com/watch?v=a_SYZhxZH2w

© अविनाश त्रिपाठी